Monday, March 2, 2009

गजल

हम क्या गजल कहें

सुनिये
सब गम के आसपास हैं, हम क्या गजल कहें
फिर आप भी उदास हैं ,हम क्या गजल कहें.

कहते हैं सियासत में, जिन्हें मुल्क की दौलत
बेघर वो बे॰लिबास हैं ,हम क्या गजल कहें.

कुछ खास क्यारियों में उगे आप हैं गुलाब
बाकी तो सब पलास हैं ,हम क्या गजल कहें.

किस्से हैं रोटियों के कई,पर सुनेगा कौन
मसले कुछ और खास हैं,हम क्या गजल कहें.

करने दुरूस्त आए थे,जो होश वक्त के
वो खुद ही बदहवास हैं,हम क्या गजल कहें.

माना कि दर्द तेज है,धीरे से बोलिये
दीवारें आसपास हैं,हम क्या गजल कहें.

सुनते हैं इन दिनों, नई तहजीब औ उसूल
कुछ जिस्म कुछ गिलास हैं ,हम क्या गजल कहें.


पर्वत कहाँ पिघलने वाला हे

कुछ भी नहीं बदलने वाला है
यही तमाशा चलने वाला है,

वही पात्र संवाद वही अभिनय
वही दृश्य फिर खुलने वाला है,

देश धंसेगा सबके यत्नों से
कीचड़ सिर्फ उछलने वाला है,

कोई हो नृप धर्म एक सबका
तुझे फर्क क्या पड़ने वाला हे,

चाय॰पान कर बीड़ी सुलगा ले
यह नाटक अब खलने वाला हे,

सिर्फ हवायें इस या उस रुख कि
पर्वत कहाँ पिघलने वाला हे,

कलम तोड़ लो यार विनोद निगम
इससे भी क्या बनने वाला हे,

कुछ भी नहीं बदलने वाला है
यही तमाशा चलने वाला है,

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