Monday, March 2, 2009

परिचय


दर्द जब इंन्तिहा से सहता हूँ
तब कहीं एक शेर कहता हूँ.।











डाँ० विनोद निगम

जन्म॰॰ अगस्त १९४४ बाराबंकी उ.प्र.
पिता॰॰ स्व.श्री बनारसी लाल निगम
माता॰ स्व.श्रीमती वनदेवी निगम
शिक्षा॰॰ बी.एस.सी. एम.काम.एम,ए,हिन्दी, पी,एच,डी,
रुचि॰॰ कविता एवं पत्रकारिता। देश की सभी प्रमुख पत्र॰पत्रिकाओं में गीतों का प्रकाशन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारण। लाल किले के मंच से काव्य पाठ। प्रारम्भ में पत्रकारिता , नवभारत टाइम्स बम्बई, देशबन्धु जागरण भोपाल का प्रतिनिधित्व ।स्कूल में ६ वर्ष एवं महाविद्यालय में ३६ वर्ष अध्यापन।

स्वतन्त्र काव्य संकलन॰ जारी हैं लेकिन यात्राएँ , अगली सदी हमारी होगी ।
समवेत संकलन॰ नवगीत दशक॰३, नवगीत अर्द्धशती, स्वान्तः सुखाय,श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन।
सम्पर्क शनीचरा,होशंगाबाद,म,प्र,
दूरभाष ०७५७४॰२५३८३९ मोबा, ०९४२५६४२५९७
ईमेल- nigamvinod@ymail.com

गीत नवगीत

इच्छाओं के तन पर
अनचाहे फूलेंगे , टेसू के फूल,
बीती दुहरायेंगे ,
तन मन भरमायेंगे,
प्राणों को छू लेंगे ,टेसू के फूल,
धूप की चिरैया,
अमराई के आंगन में फुदकेगी गाएगी,
बंसवट के कानों में,
उम्र च़ढी हवा ,प्रीति के स्वर दुहराएगी,
दृग में तिर जाएंगे,
पानी में उतराते ,जोड़े सुरखाबों के
महुए की डाल,
झुकेंगी, परिचित बाँहों सी ,बाँहों तक जाएंगी,
आसपास झूमेंगे
सुधियों को चूमेंगे,
नयनों में झूलेंगे, टेसू के फूल,

इच्छाओं के तन पर,
रह रह पुरवाई के कांटे चुभ जाएंगे,
आँखों में,
बझे हुए खालीपन के ,अनगिन बिरवे अंखुवाएंगे,
सूनापन डोलेगा,
आंगन दहलीजों के बन्द द्वार खोलेगा,
अमलतास के पत्तों से झरते चन्दन॰क्षण,
लौट नहीं आएंगे,

प्यास को उगाएंगे
सांस में समाएंगे,
जन्म भर न भूलेंगे, टेसू के फूल,

आओ, घर लौट चलें

और नहीं, भीड़ भरा यह सूनापन
आओ ,घर लौट चलें,ओ मन,

आमों में ,डोलने लगी होगी गन्ध
अरहर के आसपास ही होंगे छन्द,
टेसू के दरवाजे होगा ,यौवन
आओ , घर लौट चलें, ओ मन,

सरसों के पास ही खड़ी होगी,
मेड़ों पर ,अलसाती हुई बातचीत,
बंसवट में घुमने लगे होंगे गीत
महुओं ने घेर लिया होगा ,आंगन,

खेतों में तैरने लगे होंगे,दृश्य
गेहूँ के घर ही होगा अभी,भविष्य,
अंगड़ाता होगा खलिहान में, सृजन,

आओ , घर लौट चलें, ओ मन,
और नहीं, भीड़ भरा यह सूनापन

गाढी हो गई धुप

नीमों के नीचे भी ,
गाढी हो गई धुप
सूख गए फल वाले हरे कुंज आमों के,
फूल के बगीचे भी,

छायाएं सिमट गईं वस्त्रहीन पेड़ों में,
सूखापन बिछा हुआ, खेतों में, मेड़ों में
हाँफ रहा शहर ,गर्म हवा के थपेड़ों में,
उड़ती है तपी धूल ,
आगे भी ,पीछे भी,

सड़कों पर दूर दूर सन्नाटा.
झुलस गया कोलाहल
सूखा, आकर्षण चौराहों का
कुम्हलायी चहल॰पहल
भाप बन गए ,पुरइन वाले तालाब कुएं
कलशों का ठंडा जल,

बित्तों भर बची नदी ,
भिगो नहीं सकी मुई गोरी की घांघर को
टखनों के नीचे भी,

कमरों में जमीं हुई खामोशी,
बाहर है पिघलापन,
मौसम के आग बुझे हाथ, छू रहे तन को,
मन को भी घेरे है, एक तपन,
और एक याद, जो चमक उठती रह रह
ज्यों धूप में टंगा दर्पण ,

सुलग रहे हरियाली के आँचल,
दूब के गलीचे भी,
नीमों के नीचे भी ,
गाढी हो गई धुप


अभी बरसेंगे घन

बरसेंगे अभी ,
अभी बरसेंगे घन,

गन्धों के हाथ पकड़
दक्षिणी हवाएं ,आएंगी ही,
खिड़की के कांचों पर,
बूंदों से कोई सन्देशा ,लिख जाएंगी ही ,

बांचेगा जिसे,
जिसे बांचेगा मन,
बरसेंगे अभी ,अभी बरसेंगे घन,

दृष्टि के बहावों में,
धुंधले कुछ इन्द्र धनुष , तैरेंगे ही,
और कुछ अकेलेपन,
मौसम को बांहों भर ,
किये धरे पर पानी फेरेंगे ही,

दंशेंगे सभी प्रहर ,
दंशेंगे क्षण
बरसेंगे अभी ,अभी बरसेंगे घन,

गीली दीवारों से ,लगे बुझे,
ठंडे दालानों में,
जमे हुए सन्नाटे, पिघलेंगे ही,
अंग अंग परसेगा,ऐसा गीलापन
संयम के पाँव , जहाँ फिसलेंगे ही,
टूटेंगे सभी ,
सभी टूटेंगे ,प्रण
बरसेंगे अभी ,अभी बरसेंगे घन,


भरमा गया हूँ में

अँधेरे के चरण पकड़ूँ , उजाले का तिलक कर दूँ,
कटा दूँ शीश या फिर पाप के आगे नमन कर दूँ,
बहुत चकरा गया हूँ मैं,
जहाँ हैं बस यही दो पथ, वहाँ पर आ गया हूँ मैं,

बहुत अपराध से मैंने अभी तक मुंह चुराया था
गुनाहों कौ,तिमिर से रोशनी तक खींच लाया था,
जहाँ पर मुंह नहीं खुलते ,जबानें बर्फ हो जाती
वहाँ निर्भीक स्वर में ,जिन्दगी का गीत गाया था
मगर अब साथ वाले लोग ही उंगली उठाते हैं
खड़े हैं खुद अंधेरे में, मुझे दोषी बताते हैं
सच्चाई को हृदय बांधूं , कि सिर पर झूठ को लादूं
महल में टेक दूं घुटने, कि सब अरमान दफना दूँ,
बहुत सकुचा गया हूँ मैं
जहाँ पर सब अपरिचित हैं ,वहाँ पर आ गया हूँ मैं,

बहुत आवाज दी मैंने ,न कोई द्वार खुलता है,
सभी सुनते ,कहीं से किन्तु कुछ उत्तर न मिलता हे
नहीं पहचानता कोई, सभी के रंग बदले हैं
समझने ,सोचने के ,बोलने के ढंग बदले हैं
सही सब कर रहा हूँ,लोग फिर भी नाम धरते हैं
गलत चलता नहीं हूँ , इसलिये बदनाम करते हैं
कदम लूं चूम ताकत के , कि सच के द्वार मर जाउँ
बढाउं पैर कांटों पर , कि वापस लौट घर जाउं,
बहुत भरमा गया हूँ मैं
जहाँ कुछ भी नहीं दिखता,वहाँ पर आ गया हूँ मैं,

मुझे पहले लगा, यह रास्ता पहचानता हूँ मैं
यहाँ के लोग, पत्थर पेड़॰पौधे जानता हूँ मैं
इसी विश्वास के बल पर बहुत आगे चला आया
मगर यह भूल थी, कोरा वहम था मानता हूँ मैं
बहुत तन कर , गलत बातें यहाँ पर लोग कहते हैं
मगर खुद काम करने से, हमेशा दूर रहते हैं
सहूँ अन्याय या स्वर में बगावत का जहर घोलूँ
अकेला चीखता जाउं,कि खुद भी भीड़ में हो लूं
बहुत घबरा गया हूँ मैं
जहाँ कोई नहीं सुनता, वहाँ पर आ गया हूँ मैं,

जहाँ हैं बस यही दो पथ, वहाँ पर आ गया हूँ मैं,


टूट गया एक बार फिर

एक बन्द मुट्ठी भर, संचित संकल्प,
उठी भुजाओं भर, अपराजित विश्वास,

सारी सम्भावना पर कुंडली मारे,
बैठे हैं कुछ काले नाग,
और रहेगी कब तक राख की परत ओढे,
विस्फोटातुर यह आग,
कुछ मैले हाथों ने चोरी के धन जैसा,
बांट लिया है भविष्य
दिशाहीन पीढी के कन्धों पर बैठा है वर्तमान,
सारा नेतृत्व सिर्फ गाता है कुर्सी के राग,

सूख गया एक बार फिर
किसी भरे हुए ताल जैसा मन
हरे हरे खेतों में पकी फसल वाला एहसास,

और लिखा जायेगा कब तक यह सारा श्रम,
चन्द अकर्मण्यों के नाम,
और चलेंगे कब तक,
अवसर की गद्दी पर टिके मठाधीशों को
युग के परवश प्रणाम,
जाने कब पूर्ण हो,
मंजिल तक ले जाने वाले पथ का चुनाव,
नाप नहीं पाएंगे,बीहड़ लम्बाइयां
और फासले मन के,
सत्ता के दल॰दल में फंसे पांव,

छूट गया एक बार फिर
हाथों से तट उन्मुख लहरों का हाथ
क्षितिज पर जहाजी मस्तूलों का उगता आभास,

टूट गया एक बार फिर
एक बन्द मुट्ठी भर संचित संकल्प
उठी भुजाओं भर अपराजित विश्वास,,


सबकी उड़ती अलग ध्वजाएं

इतने सारे लोग, जमाने भर की बातें,
सबकी क्षमताएं विशाल हैं,सबकी बड़ी बड़ी औकातें,
लेकिन कोई सच्चाई के निकट नहीं है,
लेकिन कोई तरुणाई के निकट नहीं है,

आदर्शों के स्वर ऊंचे हैं, चारों तरफ लग रहे नारे,
सबने पांव तले तम रौंदा, सबके कन्धों पर उजियारे,
सबके अलग अलग पथ॰रथ हैं, सबकी उड़ती अलग ध्वजाएं,
किन्तु स्वर्ण के सिंहासन पर नत मस्तक सारे के सारे,
सभी क्रान्ति के उन्नायक हैं,
सब प्रकाश॰रथ के वाहक हैं,
लेकिन कोई सच्चाई के निकट नहीं है,

सब जनता के शुभ चिन्तक हैं, सब जनता के लिये मर रहे,
भाषण,सभा, जुलूस, सभी कुछ तो जनता के लिए कर रहे,
वर्तमान आधार हीन हे, प्रश्न चिन्ह पीते भविष्य को,
इससे क्या, आंकड़े अभी भी खुशहाली के दिए धर रहे,
नयी सुबह ,सब लाने वाले,
गीत भोर के गाने वाले,
लेकिन कोई सच्चाई के निकट नहीं है,

नंगा राष्ट्र , धनी शासक हैं, इतनी प्रगति कम नहीं होती,
सत्ता के गहरे पानी से, काले हंस चुग रहे मोती,
राजनीति फिर लौट गई है, झोपड़ियों से राजमहल में,
प्रजातन्त्र के पांव धस रहे, कुर्सी के अन्धे दल॰दल में,
सब अपने को हवन कर रहे,
नया रअष्त्र का भवन कर रहे,
लेकिन कोई सच्चाई के निकट नहीं है,


क्यों कि शहर छोटा है


सुनिये
खुलकर चलते डर लगता है, बातें करते डर लगता है,
क्यों कि शहर छोटा है,

बहुत लोग हैं , बहुत जबानें,जो कि बिना जाने पहचाने,
सिर पर राख लगा देते हैं,तिरछी आँख लगा देते हैं,
यहाँ आँख से कहीं अधिक विश्वास कान की क्षमता पर है,
यहाँ देखते डर लगता है, दृष्टि फेंकते डर लगता है,
क्यों कि शहर छोटा है,

जो कहने की बात नहीं है, वही यहाँ दुहराई जाती,
जिनके उजले हाथ नहीं हैं, उनकी महिमा गाई जाती,
यहाँ ज्ञान पर, प्रतिभा पर,अवसर का अंकुश बहुत कड़ा है,
सब अपने धन्धे में रत हैं, हाँ न्याय की बात गलत है,
क्यों कि शहर छोटा है,

ऊँचे हैं लेकिन खजूर से, मुंह है इसीलिये कहते हैं,
जहाँ बुराई फूले॰पनपे, वहां तटस्थ बने रहते हैं,
नियम और सिद्धान्त, बहुत ढंगों से परिभाषित होते हैं,
यहाँ बोलना ठीक नहीं है, कान खोलना ठीक नहीं है,
क्यों कि शहर छोटा है,

बुद्धि यहाँ पानी भरती है, सीधापन भूखों मरता है,
उसकी बड़ी प्रतिष्ठा है ,जो सारे काम गलत करता है,
यहाँ मान के नापतौल की , इकाई कंचन है धन है,
कोई सच के नहीं साथ है, यहाँ भलाई बुरी बात है,
क्यों कि शहर छोटा है,

खुलकर चलते डर लगता है, बातें करते डर लगता है,
क्यों कि शहर छोटा है,

उनको लोग नमन करते हैं,

बस्ती बड़ी अजीब यहाँ की,
न्यारी है.तहजीब यहाँ की,
जिनके सारे काम गलत हैं,सुबह गलत है शाम गलत है,
उनको लोग नमन करते हैं,

जिनके हाथों जंग लगी है, जिनकी चलती सिर्फ जुबानें,
माला लिये हुए लोगों की, उनके पीछे लगी कतारें,
जिनके रिश्ते घने जुल्म से, जो अवसर के हाथ बिक गए,
उनके प्रवचन चौराहों पर, उनके हिस्से वैभव सारे,
बिगड़े सारे काज यहाँ के,
उल्टे रीति॰ रिवाज यहाँ के,
जिनकी नीयत ठीक नहीं हे , जिनके मकसद ठीक नहीं हैं,
उनको लोग नमन करते हैं,

बकवासों से अधिक नहीं है,जिन्हें त्याग की , तप की बातें,
उनके नाम वसीयत कर दी, सुख सुविधायें जनम जनम की,
जो,मंन्दिर क्या ईश्वर तक की कर लेते हैं सौदेबाजी,
उनके माथे रोली चन्दन, उनके हाथों ध्वजा धरम की,
बिगड़ी सारी परम्पराएं,
बड़ी गलत चल रही हवाएं,
जिनके सभी अधूरे वादे, जिनके सारे गलत इरादे,
उनको लोग नमन करते हैं,

जिनके घर,ईमान पोस्टरों में टंग कर दम तोड़ चुका है,
उनका कीर्तन लोग कर रहे , उनके यश ढो रही दिशाएं,
जिनके पाप बोलते छत पर, गलियाँ जिनके दोष गा रहीं,
उनका द्वार॰द्वार अभिनन्दन, उनके गुण गा रही सभाएं,
जाने कैसा चलन यहाँ का,
बिगड़ा वातावरण यहाँ का,
जो युग के अनुकूल नहीं हैं, जिनके ठीक उसूल नहीं हैं,
उनको लोग नमन करते हैं,



इतने शोर॰॰ तमाशे में


इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में.
याद तुम्हारी आ जाती है, यह क्या कम है,


कितनी हैं उलझनें यहाँ,रोटी पानी की,
नहीं नशीले छन्द जिन्दगी रख सकते हैं,
मौसम की रंगीनी, पेट नहीं भर सकती
और न ही ये सपने, तन को ढंक सकते हैं,
इतनी उड़ती गर्द धूल में, अन्धकार में,
छबि न तुम्हारी मिट पाती है, यह क्या कम है,


कोई उत्सव नहीं , व्यर्थ की चहल पहल है,
दौड़ रहे हैं लोग, नहीं फिर भी थकते हैं,
छिड़ा हुआ संघर्ष , यहाँ आगे जाने का,
गिर जाने की छूट ,न लेकिन रुक सकते हैं,
इतने शोर तमाशे में , इस कोलाहल में
हर ध्वनि तुमको गा जाती है, यह क्या कम है


आवागमन बहुत है लेकिन प्रगति नहीं है,
अन्त और प्रारम्भ कि जैसे जुड़े हुए हैं,
पहुंच रहे हैं लोग सभी बस एक बिन्दु पर,
यों सारे पथ , जगह जगह पर मुड़े हुए हैं,
इतनी कुंठाओं में , इतने बिखरेपन में,
हवा तुम्हें दुहरा जाती है,यह क्या कम है,


इन चलते फिरते लोगों में, भीड़ भाड़ में.
याद तुम्हारी आ जाती है, तह क्या कम है,

छन्दों के द्वार चले आए,

बह दी आवाजों के घेरे,
ध्वनियों के छोड़ कर अंधेरे,
गीतों के गाँव चले आए
हम नंगे पाँव चले आए,


सड़कें थीं , सड़कों में घर थे,
कोलाहल से भरे सफर थे,
हम थे सूखे वृक्षों जैसे,
जंगल से जल रहे शहर थे,


छोड़ सुलगते सवाल सारे,
सारे संबंध रख किनारे,
अपनी चौपाल चले आए,
बेबस बेहाल चले आए,


भीतर एक सूखती नदी है,
बाहर यह रोगणी सदी है,
सांसों की मोम मछलियों को,
यह जलती रेत ही बदी हे,


अनवरत धुंएं की यात्राएं
छोड़ सभ्यता की कक्षाएं,
छन्दों के द्वार चले आए,
हम बेघरबार चले आए,


गीतों के गाँव चले आए
हम नंगे पाँव चले आए,




घटनाओं के मन ठीक नहीं


खुली भुजाएं,और नीम से छनी चांदनी
लगता है,संकल्पों के दिन ठीक नहीं है।


अनगिन दर्पण उग आए रेतीले मन में,
टूट॰॰टूट जाने की जिद करती सीमाएं,
चुप है नतमस्तक है,संयम की भषाएं,
खुले निमन्त्रण,झाँक रहे खामोश नयन में,
मदहोशी में डूबी,यह अनमनी चांदनी,
लगता है,सारे आगत के क्षण ठीक नहीं हैं,


रुको हुई हलचल है,औरअबोला पन है,
केवल बोल रहे क्षण,फिर न कभी लौटेंगे,
औ,न कभी फिर सन्नाटे के स्वर फूटेंगे,
प्राणों में तूफान सन्दली,सम्मोहन है,
तुम जैसी चंचल,तुम सी ही गुनी चांदनी,
लगता है अब और खुलापन ठीक नहीं है


नैतिक एहसासों के,मिट जाने का भय है,
मौसम सांकल बजा रहा ,धीरज के द्वारे,
सिर्फ प्रतीक्षा है,कब,किसको कौन पुकारे,
ऐसे में ,कब आँचल से बंध सका समय है,
यह सब कुछ,औ,पापों की संगिनी चांदनी,
लगता है,घटनाओं के मन ठीक नहीं है
खुली भुजाएं,और नीम से छनी चांदनी
लगता है,संकल्पों के दिन ठीक नहीं है।


खुली चांदनी का गीत


और अधिक इस खुली चांदनी में मत बैठो
जाने कब,संयम के कच्चे धागे,
अलग अलग हो जायें,
वैसे ही यह उम्र,
बहुत ज्यादा सहने के योग्य नहीं हे,
जो अधरों पर लिखा हुआ है,
वह कहने के योग्य नहीं है,
फिर यह बहकी हवा सिर्फ
बैठे रहने के योग्य नहीं हे,
और अधिक इस खुली चांदनी में मत बैठो
जाने कब यह आकर्षण,
सारी मर्यादायें धो जाये,
इस खामोशी में,
वैसे ही अस्थिर और निरंकुस है मन,
फिर इतना सामीप्य किसी का,
झुकी डाल सा सहज समर्पण,
भरी नदी के खुले किनारों सा,
नम नयनों का आमन्त्रण,
और अधिक मनचली चांदनी में मत बैठो
जाने कब यह आकर्षण,
सारी मर्यादायें धो जाये,
मौसम का यह रंग ,
स्वयं पर भी कौई विश्वास नहीं है,
फिर ये भीगी हुई बहारों के दिन हैं ,
सन्यास नहीं हे,
जो स्वाभाविक है,
उसको कुछ दूर नहीं है पास नहीं हे
और अधिक विषघुली चांदनी में मत बैठो
जाने कब,चंदन॰॰क्षण ,
जीवन भर के लिये तपन बो जायें

एक और गीत का जनम हों

एक बार और,
अधर तक आओ
एक और गीत का जनम हो,
वृक्ष में समाएं,
अर्पिता लताएं,
घेरों में बहते क्षण भर दें,
नीली पंखुरियों पर,उभरें आकृतियाँ,
फूलों पर
कुनकुने हस्ताक्षर कर दें,
चन्दन हों तपे प्रहर,
श्वांसें हों लहर॰लहर,
मन हो आकाशी, बौने सभी नियम हों,
परिचित सी देह गन्ध,
अंग अंग परसे,
पीपल के टूटे पत्ते सा,
कांपे तन फिर से,
पोर॰पोर पिघलें, सीमाएं घुल जाएं,
एक शब्द बन जाये, बस दो अक्षर से,
बाहों में पाप की ,
समर्पें कुछ पुण्य॰क्षण,
घटनाक्रम यही आजनम हो,
एक और गीत का जनम हो
एक बार और अधर तक आओ,

गजल

हम क्या गजल कहें

सुनिये
सब गम के आसपास हैं, हम क्या गजल कहें
फिर आप भी उदास हैं ,हम क्या गजल कहें.

कहते हैं सियासत में, जिन्हें मुल्क की दौलत
बेघर वो बे॰लिबास हैं ,हम क्या गजल कहें.

कुछ खास क्यारियों में उगे आप हैं गुलाब
बाकी तो सब पलास हैं ,हम क्या गजल कहें.

किस्से हैं रोटियों के कई,पर सुनेगा कौन
मसले कुछ और खास हैं,हम क्या गजल कहें.

करने दुरूस्त आए थे,जो होश वक्त के
वो खुद ही बदहवास हैं,हम क्या गजल कहें.

माना कि दर्द तेज है,धीरे से बोलिये
दीवारें आसपास हैं,हम क्या गजल कहें.

सुनते हैं इन दिनों, नई तहजीब औ उसूल
कुछ जिस्म कुछ गिलास हैं ,हम क्या गजल कहें.


पर्वत कहाँ पिघलने वाला हे

कुछ भी नहीं बदलने वाला है
यही तमाशा चलने वाला है,

वही पात्र संवाद वही अभिनय
वही दृश्य फिर खुलने वाला है,

देश धंसेगा सबके यत्नों से
कीचड़ सिर्फ उछलने वाला है,

कोई हो नृप धर्म एक सबका
तुझे फर्क क्या पड़ने वाला हे,

चाय॰पान कर बीड़ी सुलगा ले
यह नाटक अब खलने वाला हे,

सिर्फ हवायें इस या उस रुख कि
पर्वत कहाँ पिघलने वाला हे,

कलम तोड़ लो यार विनोद निगम
इससे भी क्या बनने वाला हे,

कुछ भी नहीं बदलने वाला है
यही तमाशा चलने वाला है,

साहित्यिक स्मृतियाँ


नवगीत समारोह में महादेवी वर्मा के साथ डा.विनोद निगम

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ डा।विनोद निगम





अपने मित्रों के साथ डा.विनोद निगम





कवि के प्रथम काव्य संकलन " जारी हैं लेकिन यात्राएँ" का विमोचन करते प्रख्यात नवगीतकार डा.ओमप्रभाकर






युवावस्था में डा.विनोद निगम






"अगली सदी हमारी होगी" का विमोचन करते मुख्यमंत्री श्री मोतीलाल वोरा







डा. शिव मंगल सिंह सुमन के साथ डा.विनोद निगम








उत्तर प्रदेश के एक काव्य समारोह में डा.विनोद निगम









महाविद्यालयीन छात्र डा.विनोद निगम










सेवा निवृत्ति के अवसर पर विदाई अभिनन्दन











डा.श्रीराम परिहार, डा.बुद्धिनाथ मिश्र,डा.माहेश्वर तिवारी,श्री सुरेश उपाध्याय,एवं मित्रों के साथ डा.विनोद निगम













विख्यात शायर डा.बशीर बद्र के साथ डा.विनोद निगम













स्वागत एवं अभिनन्दन से आभारी डा.विनोद निगम













सम्मतियाँ

विनोद निगम एक प्रखर और सिद्ध गीतकार हैं । , जारी हैं लेकिन यात्राएं , उनकी महत्वपूर्ण गीतात्मक उपलब्धि है। युग की धड़कनों को उन्होंने सुना है और नयी के निरर्थक शोर शराबे के बीच अपने गीतों में उन धड़कनों को स्वरबद्ध किया है। इससे उनके मौलिक काव्य व्यक्तित्व का पता चलता है, जो फैशन परस्ती और राजकीय प्रलोभनों की धारा में प्रवाह पतित नहीं हो सकता। तमाम बिना रीढ की हड्डी वाले कवियों के बीच से अपनी अलग राह बनाकर चलने वाले इस कवि ने कवि सम्मेलनी लिजलिजे गीतों के रचनाकारों से भिन्न अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाई है।उनकी काव्यकृति नवगीत की
दिशा में एक सार्थक एवं मूल्यवान कदम है। विनोद आगे आने वाले वर्षों में नवगीत की धारा को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करेंगे।
स्व, डाँ॑, शम्भुनाथ सिंह ,वाराणसी

विनोद निगम एक महत्वपूर्ण
गीतकार
हैं,नवगीत विधा को
सम्पन्न करने में उन्होंने बहुत उल्लेखनीय कार्य किया हे।छन्द और गीत के प्रति उनकी आस्था की निरन्तरता सिद्ध
करती
है कि कविता की ताजगी और कथ्य की सार्थकता के लिए अवसरवादी होना जरूरी नहीं है।इतिहास की मांग है कि नवगीत विधा को सम्पन्न करने का कठिन कार्य किया जाय। विनोद भाई इसे सफलता पूर्वक किये जा रहे हैं. उनकी यात्राएं जारी हैं, जारी रहेंगी।

स्व,श्री वीरेन्द्र मिश्र , बम्बई,